Tuesday, August 10, 2010

       तुम्हारा प्यार



 मृगमरीचिका ही सही


       मगर


फिर भी दौड़ती हूँ


      क्यूँ ?


    क्योंकि


तुम्हारा प्यार मिलने की आस भी


      मुझे


सिर्फ इसी दिशा में दिखाती है....
 
   by--raj jain.

आईना कहे न कहे



   मुस्कुराने लगी हूँ मैं


      झुकी पलकों तले


         लजाने लगी हूँ मैं.....

      by---raj jain.


     
नदी के दो किनारों को



मुस्कुराते देखा


कह रहे थे ...




दूर ही सही


तुम्हारे साथ होने का अहसास


क्या कम है.....
चौदह वर्षों के


बनवास पर तो


राम भी घर


लौट आये थे






मेरे सुने हृदय के आँगन में


कब


तुम


मेरे अपने बन कर


आओगे....???

Monday, August 9, 2010

तुम कब आओगे...



चौदह वर्षों के


बनवास पर तो


राम भी घर


लौट आये थे






मेरे सुने हृदय के आँगन में


कब


तुम


मेरे अपने बन कर


आओगे....???







Thursday, August 5, 2010